आज अजीब हंगामा है राजनीति में. कही भ्रष्टाचार को ख़त्म करने की जंग है तो कही इसको सही ठहराने की मशक्कत अन्ना टीम देश के अवाम की आवाज़ बन कर इसे ख़त्म करना चाहती है तो सत्ताधारी दल इसको जायज बताने की हर प्रकार की कोशिश कर रहा है .लेकिन इस पर रोक लगाने के लिए वो जन लोकपाल बनाने के लिए तैयार नहीं .सरकार की इस नीयत का अंदाज़ा उसकी कार्यशाली से सहज ही लग जाता है.
जब बाबा रामदेव ने विदेशी बैंकों में जमा काले धन की वापसी की मांग को लेकर रामलीला मैदान में शांतिपूर्ण अनशन पर बैठे तो रात के अंधेरे में सोये हुए निहत्थे लोगों पर लाठी चार्ज करवा कर यह सन्देश दिया गया कि सरकार काले धन की वापसी के पक्ष में नहीं है और इस मांग से उसका हित आहत हुआ है. इसके बाद भी बाबा और उनके करीबी लोगों पर फंदा कसकर यह समझाया गया कि इस तरह की मांग करोगे तो तुम्हें बर्बाद कर दिया जायेगा. इतना ही नहीं उच्चतम न्यायलय ने सीट का गठन करने और काले धन के विरुद्ध तेज़ी से कार्रवाई का मार्ग प्रशस्त किया तो सरकार ने उसके विरुद्ध पुनर्विचार याचिका दायर कर काले धन के मामले में अपनी मंशा स्पष्ट कर दी. यह तमाम बातें इस बात को इंगित करती हैं कि सरकार काले धन को ख़त्म करने की जगह उसे संरक्षण देने का इरादा रखती है.
विदेशी बैंकों में जमा भारतीय काला धन का मूल स्रोत उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार है इसमें कोई दो राय नहीं. सरकार इसका संरक्षण करती दिख रही है. जन लोकपाल के मामले में भी उसका यही रवैया है. वह इसे जहां तक संभव हो टालने और दबाने का प्रयास कर रही है. इसी लिए टीम अन्ना को निशाना बनाया जा रहा है. ऐसा लगता है जैसे यह देश एक माफिया गिरोह के चंगुल में कसमसा रहा हो. इससे निजात दिलाने की जिम्मेवारी अंततः जनता को ही उठानी होगी. यदि राजनीति पर आर्थिक लुटेरों का बर्चस्व लम्बे समय तक इसी तरह बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब संसदीय लोकतंत्र से लोगों का पूरी तरह मोह भंग हो जायेगा.
जब बाबा रामदेव ने विदेशी बैंकों में जमा काले धन की वापसी की मांग को लेकर रामलीला मैदान में शांतिपूर्ण अनशन पर बैठे तो रात के अंधेरे में सोये हुए निहत्थे लोगों पर लाठी चार्ज करवा कर यह सन्देश दिया गया कि सरकार काले धन की वापसी के पक्ष में नहीं है और इस मांग से उसका हित आहत हुआ है. इसके बाद भी बाबा और उनके करीबी लोगों पर फंदा कसकर यह समझाया गया कि इस तरह की मांग करोगे तो तुम्हें बर्बाद कर दिया जायेगा. इतना ही नहीं उच्चतम न्यायलय ने सीट का गठन करने और काले धन के विरुद्ध तेज़ी से कार्रवाई का मार्ग प्रशस्त किया तो सरकार ने उसके विरुद्ध पुनर्विचार याचिका दायर कर काले धन के मामले में अपनी मंशा स्पष्ट कर दी. यह तमाम बातें इस बात को इंगित करती हैं कि सरकार काले धन को ख़त्म करने की जगह उसे संरक्षण देने का इरादा रखती है.
विदेशी बैंकों में जमा भारतीय काला धन का मूल स्रोत उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार है इसमें कोई दो राय नहीं. सरकार इसका संरक्षण करती दिख रही है. जन लोकपाल के मामले में भी उसका यही रवैया है. वह इसे जहां तक संभव हो टालने और दबाने का प्रयास कर रही है. इसी लिए टीम अन्ना को निशाना बनाया जा रहा है. ऐसा लगता है जैसे यह देश एक माफिया गिरोह के चंगुल में कसमसा रहा हो. इससे निजात दिलाने की जिम्मेवारी अंततः जनता को ही उठानी होगी. यदि राजनीति पर आर्थिक लुटेरों का बर्चस्व लम्बे समय तक इसी तरह बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब संसदीय लोकतंत्र से लोगों का पूरी तरह मोह भंग हो जायेगा.
No comments:
Post a Comment