Thursday, 14 April 2011

अन्ना हजारे की जंग अवाम की आवाज़

अन्ना  हजारे की जंग देश  के अवाम की  आवाज़ है. यह उस परिवर्तन की और इशारा करती है जिस थर्ड  फ़ोर्स की वर्षों से राजनीतिक गलियारे में चर्चा होती रही है. उस तूफ़ान का यह पहला झटका मात्र है जिसका प्रदर्शन विगत दिनों जंतर-मंतर पर देखने को मिला. इस प्रदर्शन से घबडाये और बौखलाए भ्रष्ट रजनीतिज्ञ अनाप-सनाप बयानबाज़ी करने की हदें पार कर रहे हैं. किसी ने तो अन्ना को चुनाव लड़ने की चुनौती दे डाली. किसी ने जंतर-मंतर पर उमड़े जनसैलाब के बावत आर्थिक व्यय का स्रोत मांग डाला. इस सन्दर्भ में गौरतलब बात यह है कि विभिन्न पार्टियों द्वारा आधे से अधिक आपराधिक चरित्र के उम्मीदवार खड़े किये जाते हैं जो विजयी होकर भी आते हैं. इसका कदापि यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए कि वो सारे अपराधों से मुक्त हो गए या चुनाव में विजयी होना उनकी स्वच्छता का प्रमाण है. वर्तमान राजनीति में जो गैरजिम्मेवाराना व्यवहार देशहित के सन्दर्भ में और जिन नैतिक मूल्यों का ह्रास और जिस तरह से अपराधिक तत्वों का जमघट हुआ है, अच्छे लोगों ने राजनीति में शिरकत करना बंद कर दिया है. जयप्रकाश आन्दोलन के पहले तक कोई नृप हो हमें क्या हानि की मानसिकता के साथ आम जनता राजनीति से उदासीन हो चली थी. लेकिन जेपी आन्दोलन के बाद जनता में उदासीनता के भाव का लोप हो गया और राजनैतिक गतिविधियों पर तर्क-वितर्क प्रारंभ हो गया. गलत और सही का फर्क किया जाने लगा. नैतिकता और अनैतिकता पर बहस होने लगी.यह उसी जागरूकता का परिणाम है की आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे  सदन के विरोध में आमजन की भावना ज्वालामुखी बनकर अन्ना हजारे के समर्थन में जंतर-मंतर में उमड़ आई. निसंदेह यह घटना पेशेवर राजनीतिज्ञों को बौखला देनेवाली थी.क्योंकि उन्हें अपना तम्बू उखड़ने के खतरे का आभास हो चला था. अब देश जाग चुका है. इन राजनीतिज्ञों की दुकानें बंद होने का वक़्त आ चला है. लोकतंत्र को जागृत लोकशक्ति प्राप्त हो चुकी है. लिहाज़ा पिछले 60 सालों से लोकतान्त्रिक मूल्यों को नष्ट कर अपना उल्लू सीधा करने वाले कुनबों की बौखलाहट लाजिमी है. लेकिन वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है. उसका पतन अवश्यम्भावी है. 
---नागेन्द्र 

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