ऐसी जानकारी मिल रही है कि टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले में आरोपियों की सूची में अपना नाम आने के बाद चिदंबरम साहब ने तो इस्तीफा दे दिया लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उसे स्वीकार नहीं कर रहे हैं और उन्हें निर्दोष सिद्ध करने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा रहे हैं. प्रधानमंत्री महोदय ने स्वयं कहा था कि गठबंधन धर्म निभाने के लिए उन्हें घोटालों की अनदेखी करनी पड़ी है. चिदंबरम साहब के मामले में गठबंधन धर्म कहां आड़े आता है. आरोप लगा है और वे निर्दोष हैं तो जांच करा लेने में हर्ज़ क्या है. लोकसभा की कार्रवाई को दो दिनों तक इस मुद्दे को लेकर बाधित होने देने के पीछे प्रधानमंत्री जी के पास क्या मजबूरी थी. देस के लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं. किसी का सात खून माफ़ और किसी की छोटी सी गलती भी अपराध क्यों. बचाना ही था तो ए राजा और कनिमोझी को क्यों नहीं बचाया. उन्हें बलि का बकरा क्यों बनाया. इस घोटाले में कुछ वरिष्ठ पत्रकारों के नाम भी आये थे. उनकी जांच क्यों नहीं. या तो यह सरकार पूरी बेशर्मी के साथ कह दे कि घोटाला हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है या फिर इसकी निष्पक्ष जांच कराये. इतना बड़ा घोटाला और प्रधानमंत्री को भनक तक नहीं. वाह भाई वाह! देश आपके कन्धों पर आखिर कितना सुरक्षित? आप स्वयं निर्णय करें.
वक़्त की आवाज़
Wednesday, 23 November 2011
Saturday, 19 November 2011
माफिया के शिकंजे में देश
आज अजीब हंगामा है राजनीति में. कही भ्रष्टाचार को ख़त्म करने की जंग है तो कही इसको सही ठहराने की मशक्कत अन्ना टीम देश के अवाम की आवाज़ बन कर इसे ख़त्म करना चाहती है तो सत्ताधारी दल इसको जायज बताने की हर प्रकार की कोशिश कर रहा है .लेकिन इस पर रोक लगाने के लिए वो जन लोकपाल बनाने के लिए तैयार नहीं .सरकार की इस नीयत का अंदाज़ा उसकी कार्यशाली से सहज ही लग जाता है.
जब बाबा रामदेव ने विदेशी बैंकों में जमा काले धन की वापसी की मांग को लेकर रामलीला मैदान में शांतिपूर्ण अनशन पर बैठे तो रात के अंधेरे में सोये हुए निहत्थे लोगों पर लाठी चार्ज करवा कर यह सन्देश दिया गया कि सरकार काले धन की वापसी के पक्ष में नहीं है और इस मांग से उसका हित आहत हुआ है. इसके बाद भी बाबा और उनके करीबी लोगों पर फंदा कसकर यह समझाया गया कि इस तरह की मांग करोगे तो तुम्हें बर्बाद कर दिया जायेगा. इतना ही नहीं उच्चतम न्यायलय ने सीट का गठन करने और काले धन के विरुद्ध तेज़ी से कार्रवाई का मार्ग प्रशस्त किया तो सरकार ने उसके विरुद्ध पुनर्विचार याचिका दायर कर काले धन के मामले में अपनी मंशा स्पष्ट कर दी. यह तमाम बातें इस बात को इंगित करती हैं कि सरकार काले धन को ख़त्म करने की जगह उसे संरक्षण देने का इरादा रखती है.
विदेशी बैंकों में जमा भारतीय काला धन का मूल स्रोत उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार है इसमें कोई दो राय नहीं. सरकार इसका संरक्षण करती दिख रही है. जन लोकपाल के मामले में भी उसका यही रवैया है. वह इसे जहां तक संभव हो टालने और दबाने का प्रयास कर रही है. इसी लिए टीम अन्ना को निशाना बनाया जा रहा है. ऐसा लगता है जैसे यह देश एक माफिया गिरोह के चंगुल में कसमसा रहा हो. इससे निजात दिलाने की जिम्मेवारी अंततः जनता को ही उठानी होगी. यदि राजनीति पर आर्थिक लुटेरों का बर्चस्व लम्बे समय तक इसी तरह बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब संसदीय लोकतंत्र से लोगों का पूरी तरह मोह भंग हो जायेगा.
जब बाबा रामदेव ने विदेशी बैंकों में जमा काले धन की वापसी की मांग को लेकर रामलीला मैदान में शांतिपूर्ण अनशन पर बैठे तो रात के अंधेरे में सोये हुए निहत्थे लोगों पर लाठी चार्ज करवा कर यह सन्देश दिया गया कि सरकार काले धन की वापसी के पक्ष में नहीं है और इस मांग से उसका हित आहत हुआ है. इसके बाद भी बाबा और उनके करीबी लोगों पर फंदा कसकर यह समझाया गया कि इस तरह की मांग करोगे तो तुम्हें बर्बाद कर दिया जायेगा. इतना ही नहीं उच्चतम न्यायलय ने सीट का गठन करने और काले धन के विरुद्ध तेज़ी से कार्रवाई का मार्ग प्रशस्त किया तो सरकार ने उसके विरुद्ध पुनर्विचार याचिका दायर कर काले धन के मामले में अपनी मंशा स्पष्ट कर दी. यह तमाम बातें इस बात को इंगित करती हैं कि सरकार काले धन को ख़त्म करने की जगह उसे संरक्षण देने का इरादा रखती है.
विदेशी बैंकों में जमा भारतीय काला धन का मूल स्रोत उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार है इसमें कोई दो राय नहीं. सरकार इसका संरक्षण करती दिख रही है. जन लोकपाल के मामले में भी उसका यही रवैया है. वह इसे जहां तक संभव हो टालने और दबाने का प्रयास कर रही है. इसी लिए टीम अन्ना को निशाना बनाया जा रहा है. ऐसा लगता है जैसे यह देश एक माफिया गिरोह के चंगुल में कसमसा रहा हो. इससे निजात दिलाने की जिम्मेवारी अंततः जनता को ही उठानी होगी. यदि राजनीति पर आर्थिक लुटेरों का बर्चस्व लम्बे समय तक इसी तरह बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब संसदीय लोकतंत्र से लोगों का पूरी तरह मोह भंग हो जायेगा.
Thursday, 14 April 2011
अन्ना हजारे की जंग अवाम की आवाज़
अन्ना हजारे की जंग देश के अवाम की आवाज़ है. यह उस परिवर्तन की और इशारा करती है जिस थर्ड फ़ोर्स की वर्षों से राजनीतिक गलियारे में चर्चा होती रही है. उस तूफ़ान का यह पहला झटका मात्र है जिसका प्रदर्शन विगत दिनों जंतर-मंतर पर देखने को मिला. इस प्रदर्शन से घबडाये और बौखलाए भ्रष्ट रजनीतिज्ञ अनाप-सनाप बयानबाज़ी करने की हदें पार कर रहे हैं. किसी ने तो अन्ना को चुनाव लड़ने की चुनौती दे डाली. किसी ने जंतर-मंतर पर उमड़े जनसैलाब के बावत आर्थिक व्यय का स्रोत मांग डाला. इस सन्दर्भ में गौरतलब बात यह है कि विभिन्न पार्टियों द्वारा आधे से अधिक आपराधिक चरित्र के उम्मीदवार खड़े किये जाते हैं जो विजयी होकर भी आते हैं. इसका कदापि यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए कि वो सारे अपराधों से मुक्त हो गए या चुनाव में विजयी होना उनकी स्वच्छता का प्रमाण है. वर्तमान राजनीति में जो गैरजिम्मेवाराना व्यवहार देशहित के सन्दर्भ में और जिन नैतिक मूल्यों का ह्रास और जिस तरह से अपराधिक तत्वों का जमघट हुआ है, अच्छे लोगों ने राजनीति में शिरकत करना बंद कर दिया है. जयप्रकाश आन्दोलन के पहले तक कोई नृप हो हमें क्या हानि की मानसिकता के साथ आम जनता राजनीति से उदासीन हो चली थी. लेकिन जेपी आन्दोलन के बाद जनता में उदासीनता के भाव का लोप हो गया और राजनैतिक गतिविधियों पर तर्क-वितर्क प्रारंभ हो गया. गलत और सही का फर्क किया जाने लगा. नैतिकता और अनैतिकता पर बहस होने लगी.यह उसी जागरूकता का परिणाम है की आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे सदन के विरोध में आमजन की भावना ज्वालामुखी बनकर अन्ना हजारे के समर्थन में जंतर-मंतर में उमड़ आई. निसंदेह यह घटना पेशेवर राजनीतिज्ञों को बौखला देनेवाली थी.क्योंकि उन्हें अपना तम्बू उखड़ने के खतरे का आभास हो चला था. अब देश जाग चुका है. इन राजनीतिज्ञों की दुकानें बंद होने का वक़्त आ चला है. लोकतंत्र को जागृत लोकशक्ति प्राप्त हो चुकी है. लिहाज़ा पिछले 60 सालों से लोकतान्त्रिक मूल्यों को नष्ट कर अपना उल्लू सीधा करने वाले कुनबों की बौखलाहट लाजिमी है. लेकिन वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है. उसका पतन अवश्यम्भावी है.
---नागेन्द्र
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